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मनसादेवी स्तोत्रम्

मनसादेवी स्तोत्रम् 

।। अथ ध्यानः ।।
चारु-चम्पक-वर्णाभां, सर्वांग-सु-मनोहराम् ।नागेन्द्र-वाहिनीं देवीं, सर्व-विद्या-विशारदाम् ।।

।। मूल-स्तोत्र ।।
श्रीनारायण उवाच ।नमः सिद्धि-स्वरुपायै, वरदायै नमो नमः ।नमः कश्यप-कन्यायै, शंकरायै नमो नमः ।।
बालानां रक्षण-कर्त्र्यै, नाग-देव्यै नमो नमः ।नमः आस्तीक-मात्रे ते, जरत्-कार्व्यै नमो नमः ।।
तपस्विन्यै च योगिन्यै, नाग-स्वस्रे नमो नमः ।साध्व्यै तपस्या-रुपायै, शम्भु-शिष्ये च ते नमः ।।

।। फल-श्रुति ।।
इति ते कथितं लक्ष्मि ! मनसाया स्तवं महत् ।यः पठति नित्यमिदं, श्रावयेद् वापि भक्तितः ।।
न तस्य सर्प-भीतिर्वै, विषोऽप्यमृतं भवति ।वंशजानां नाग-भयं, नास्ति श्रवण-मात्रतः ।।

।।अथ द्वितीय मनसादेवी स्तोत्रम् ।।
देवी त्वां स्तोतुमिच्छामि सा विनां प्रवरा परम् ।‎परात्परां च परमां नहि स्तोतुं क्षयोsधुना ।। १ ।।
स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वभावाव्यानत: परम् ।‎न क्षम: प्रकृति वक्तुं गुणानां तब सुव्रते ।। २ ।।
शुद्रसत्वस्वरुपा त्वम् कोपहिंसाविवर्जिता ।‎न च सप्तो मुनिस्तेन त्यक्तया च त्वया यत: ।। ३ ।।
त्वं मया पूजिता साध्वी जननी च यथाsदिति: ।‎दयारुपा च भगिनी क्षमारुपा यथा प्रसु: ।। ४ ।।
त्वया मे रक्षिता: प्राणा: पुत्रदारा सुरेश्वरी ।‎अहं करोमि त्वां पूज्यां मम प्रीतिश्छ वर्धते ।। ५ ।।
नित्यं यद्यपि पूज्यां त्वां भवेsत्र जगदम्बिके ।‎तथाsपि तव पूजां वै वर्धयामि पुन: पुन: ।। ६ ।।
ये त्वयाषाढसङ्क्रान्त्या पूजयिष्यन्ति भक्तित: ।‎पञ्चम्यां मनसारव्या यां मासान्ते दिने दिने ।। ७ ।।
पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते न धनानि च ।‎यशस्विन: कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विता: ।। ८ ।।
ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जना: ।‎लक्ष्मी हीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा ।। ९ ।।
त्वं स्वर्गलक्ष्मी: स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला ।‎नारायणांशो भगवन् जरत्कारुर्मुनीश्वर: ।। १० ।।
तपसा तेजसा त्वं च मनसा ससृजे पिता ।‎अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिदा ।। ११ ।।
मनसादेवी त्वं शक्त्या चाssत्मना सिद्धयोगिनी ।‎तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे ।। १२ ।।
यां भक्त्या मनसा देवा: पूजयन्त्यंनिशं भृशम् ।‎तेन त्वं मनसादेवीं प्रवदन्ति पुराविद: ।। १३ ।।
सत्त्वरुपा च देवी त्वं शश्वत्सर्वानषेवया ।‎यो हि यद्भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम् ।। १४ ।।
इदं स्तोत्रं पुण्यवीजं तां संपूज्य च य: पठेत् ।‎तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।। १५ ।।
विषं भवेत्सुधातुल्य सिद्धस्तोत्रं यदा पठेत् ।‎पञ्चलक्ष जपेनैव सिद्ध्यस्तोत्रो भवेन्नर ।।‎सर्पशायी भवेत्सोsपि निश्चितं सर्ववाहन: ।। १६ ।।‎
।। इति महेन्द्रकृतं मनसादेवीस्तोत्रं समसम्पूर्णम् ।।


।। अथ मनसा द्वादशनाम स्तोत्रम् ।।
ॐ नमो मनसायैजरत्कारु जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी ।‎वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।। १ ।।
जरत्कारुप्रियाssस्तीकमाता विषहरीती च ।‎महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।। २ ।।
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले च य: पठेत् ।‎तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भस्य च ।। ३ ।।
नागभीते च शयने नागग्रस्ते च मन्दिरे ।‎नागभीते महादुर्गे नागवेष्ठितविग्रहे ।। ४ ।।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु मुञ्चते नात्रसंशय: ।‎नित्यं पठेद् य: तं दृष्ट्वा नागवर्ग: पलायते ।। ५ ।।
नागौधं भूषणं कृत्वा स भवेत् नागवाहना: ।‎नागासनो नागतल्पो महासिद्धो भवेन्नर: ।। ६ ।।
।। इति मनसादेवीद्वादशनाम स्तोत्र सम्पूर्णम् ।। 



 मनसादेवी स्तोत्रम्
।। अथ ध्यानः ।।


चारु-चम्पक-वर्णाभां, सर्वांग-सु-मनोहराम् ।
नागेन्द्र-वाहिनीं देवीं, सर्व-विद्या-विशारदाम् ।।
।। मूल-स्तोत्र ।।
श्रीनारायण उवाच ।
नमः सिद्धि-स्वरुपायै, वरदायै नमो नमः ।
नमः कश्यप-कन्यायै, शंकरायै नमो नमः ।।


बालानां रक्षण-कर्त्र्यै, नाग-देव्यै नमो नमः ।
नमः आस्तीक-मात्रे ते, जरत्-कार्व्यै नमो नमः ।।


तपस्विन्यै च योगिन्यै, नाग-स्वस्रे नमो नमः ।
साध्व्यै तपस्या-रुपायै, शम्भु-शिष्ये च ते नमः ।।


।। फल-श्रुति ।।
इति ते कथितं लक्ष्मि ! मनसाया स्तवं महत् ।
यः पठति नित्यमिदं, श्रावयेद् वापि भक्तितः ।।


न तस्य सर्प-भीतिर्वै, विषोऽप्यमृतं भवति ।
वंशजानां नाग-भयं, नास्ति श्रवण-मात्रतः ।।


।।अथ द्वितीय मनसादेवी स्तोत्रम् ।।


देवी त्वां स्तोतुमिच्छामि सा विनां प्रवरा परम् ।
‎परात्परां च परमां नहि स्तोतुं क्षयोsधुना ।। १ ।।


स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वभावाव्यानत: परम् ।
‎न क्षम: प्रकृति वक्तुं गुणानां तब सुव्रते ।। २ ।।


शुद्रसत्वस्वरुपा त्वम् कोपहिंसाविवर्जिता ।
‎न च सप्तो मुनिस्तेन त्यक्तया च त्वया यत: ।। ३ ।।


त्वं मया पूजिता साध्वी जननी च यथाsदिति: ।
‎दयारुपा च भगिनी क्षमारुपा यथा प्रसु: ।। ४ ।।


त्वया मे रक्षिता: प्राणा: पुत्रदारा सुरेश्वरी ।
‎अहं करोमि त्वां पूज्यां मम प्रीतिश्छ वर्धते ।। ५ ।।


नित्यं यद्यपि पूज्यां त्वां भवेsत्र जगदम्बिके ।
‎तथाsपि तव पूजां वै वर्धयामि पुन: पुन: ।। ६ ।।


ये त्वयाषाढसङ्क्रान्त्या पूजयिष्यन्ति भक्तित: ।
‎पञ्चम्यां मनसारव्या यां मासान्ते दिने दिने ।। ७ ।।


पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते न धनानि च ।
‎यशस्विन: कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विता: ।। ८ ।।


ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जना: ।
‎लक्ष्मी हीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा ।। ९ ।।


त्वं स्वर्गलक्ष्मी: स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला ।
‎नारायणांशो भगवन् जरत्कारुर्मुनीश्वर: ।। १० ।।


तपसा तेजसा त्वं च मनसा ससृजे पिता ।
‎अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिदा ।। ११ ।।


मनसादेवी त्वं शक्त्या चाssत्मना सिद्धयोगिनी ।
‎तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे ।। १२ ।।


यां भक्त्या मनसा देवा: पूजयन्त्यंनिशं भृशम् ।
‎तेन त्वं मनसादेवीं प्रवदन्ति पुराविद: ।। १३ ।।


सत्त्वरुपा च देवी त्वं शश्वत्सर्वानषेवया ।
‎यो हि यद्भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम् ।। १४ ।।


इदं स्तोत्रं पुण्यवीजं तां संपूज्य च य: पठेत् ।
‎तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।। १५ ।।


विषं भवेत्सुधातुल्य सिद्धस्तोत्रं यदा पठेत् ।
‎पञ्चलक्ष जपेनैव सिद्ध्यस्तोत्रो भवेन्नर ।।
‎सर्पशायी भवेत्सोsपि निश्चितं सर्ववाहन: ।। १६ ।।
‎।। इति महेन्द्रकृतं मनसादेवीस्तोत्रं समसम्पूर्णम् ।।


।। अथ मनसा द्वादशनाम स्तोत्रम् ।।


ॐ नमो मनसायै
जरत्कारु जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी ।
‎वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।। १ ।।


जरत्कारुप्रियाssस्तीकमाता विषहरीती च ।
‎महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।। २ ।।


द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले च य: पठेत् ।
‎तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भस्य च ।। ३ ।।


नागभीते च शयने नागग्रस्ते च मन्दिरे ।
‎नागभीते महादुर्गे नागवेष्ठितविग्रहे ।। ४ ।।


इदं स्तोत्रं पठित्वा तु मुञ्चते नात्रसंशय: ।
‎नित्यं पठेद् य: तं दृष्ट्वा नागवर्ग: पलायते ।। ५ ।।


नागौधं भूषणं कृत्वा स भवेत् नागवाहना: ।
‎नागासनो नागतल्पो महासिद्धो भवेन्नर: ।। ६ ।।

।। इति मनसादेवीद्वादशनाम स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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