श्रीराम तांडव स्तोत्रम्
श्रीराम तांडव स्तोत्रम् [सानुवाद] इंद्रादयो ऊचु: (इंद्र आदि ने कहा) जटाकटाहयुक्तमुण्डप्रान्तविस्तृतम् हरे: अपांगक्रुद्धदर्शनोपहार चूर्णकुन्तलः। प्रचण्डवेगकारणेन पिंजलः प्रतिग्रहः स क्रुद्धतांडवस्वरूपधृक् विराजते हरि: ॥१॥ जटासमूह से युक्त विशालमस्तक वाले श्रीहरि के क्रोधित हुए लाल आंखों की तिरछी नज़र से, विशाल जटाओं के बिखर जाने से रौद्र मुखाकृति एवं प्रचण्ड वेग से आक्रमण करने के कारण विचलित होती, इधर उधर भागती शत्रुसेना के मध्य तांडव (उद्धत विनाशक क्रियाकलाप) स्वरूप धारी भगवान् हरि शोभित हो रहे हैं। अथेह व्यूहपार्ष्णिप्राग्वरूथिनी निषंगिनः तथांजनेयऋक्षभूपसौरबालिनन्दना:। प्रचण्डदानवानलं समुद्रतुल्यनाशका: नमोऽस्तुते सुरारिचक्रभक्षकाय मृत्यवे ॥२॥ अब वो देखो !! महान् धनुष एवं तरकश धारण वाले प्रभु की अग्रेगामिनी, एवं पार्श्वरक्षिणी महान् सेना जिसमें हनुमान्, जाम्बवन्त, सुग्रीव, अंगद आदि वीर हैं, प्रचण्ड दानवसेना रूपी अग्नि के शमन के लिए समुद्रतुल्य जलराशि के समान नाशक हैं, ऐसे मृत्युरूपी दैत्यसेना के भक्षक के लिए मेरा प्रणाम है। कलेवरे कषायवासहस्तकार्मुकं हरे: उपासनोपसंग...