Mahashivratri Katha - 5 | शंखचूड़ का वध

शिव उपासना में शंख का इस्तेमाल वर्जित माना जाता है। दरअसल भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था, जो भगवान विष्णु का भक्त था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है। इसलिए शिवजी की पूजा में कभी भी शंख नहीं बजाना चाहिए। [[श्रीमद् भागवतम् स्कंद १० I अध्याय ३४ ]] दैत्यराज दंभ ने श्रीहरि को प्रसन्नकर उनके समान बलवान पुत्र शंखचूड़ प्राप्त किया. आरंभ में शंखचूड़ धर्मवान था. उसने पुष्कर में तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया व देवताओं से अजेय होने का वर मांगा. ब्रह्माजी ने मनचाहे वर के साथ नारायण कवच भी प्रदान किया. शंखचूड का विवाह साध्वी तुलसी से हुआ. श्रीहरि के आशीर्वाद से जन्मे व ब्रह्मा से वरदान प्राप्त शंखचूड ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया. त्रस्त देवता श्रीहरि की शरण में गए. प्रभु बोले- शंखचूड़ मेरे वरदान से जन्मा है. उसका अंत केवल महादेव ही कर सकते हैं. देवों ने महादेव को कष्ट और श्रीहरि का आदेश बताया तो शिवजी उसके अंत को तैयार हो गए. शिवजी और शंखचूड़ के बीच युद्ध शुरू हुआ. नारायण कवच के अलावा पत्नी तुलसी ने पतिव्रत के प्रभाव से शंखचूड़ को अभेद्य कवच से युक्त कर दिया...

Mahashivratri Katha - 4

फाल्गुन मास के दिन आने वाली महाशिवरात्रि पर शिव जी और मां पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए भी इस पर्व को महाशिवरात्रि कहा जाता है। इस दिन शिव की पूजा विधि विधान से करें। शिव जी पर एक लोटा जल चढ़ाने से ही भगवान इंसान की मुराद पूरी कर देता है। 

Mahashivratri Katha - 3 | नीलकंठ

भागवत् पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग के मुख में भयंकर विष की ज्वालाएं उठी और वे समुद्र में मिश्रित हो विष के रूप में प्रकट हो गई। विष की यह आग की ज्वालाएं पूरे आकाश में फैलकर सारे जगत को जलाने लगी। इसके बाद सभी देवता, ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास मदद के लिए गए। इसके बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और उस विष को पी लिया। इसके बाद से ही उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा। 

Mahashivratri katha-2

भगवान शिव ने केतकी का फूल का  पूजा से किए त्याग क्यों किया ? शिवरात्रि हर माह के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, किन्तु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी कौन बड़ा और कौन छोटा है, इस बात का फैसला कराने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। इस पर भगवान शिव ने एक शिवलिंग को प्रकट कर उन्हें उसके आदि और अंत पता लगाने को कहा। उन्होंने कहा जो इस बात का उत्तर दे देगा वही बड़ा है। इसके बाद विष्णु जी उपर की ओर चले और काफी दूर तक जाने के बाद पता नहीं लगा पाए। उधर ब्रह्मा जी नीचे की ओर चले और उन्हें भी कोई छोर न मिला। नीचे की ओर जाते समय उनकी नजर केतकी के पुष्प पर पड़ी, जो उनके साथ चला आ रहा था। उन्होंने केतकी के पुष्प को भगवान शिव से झूठ बोलने के लिए मना लिया। जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से कहा कि मैंने पता लगा लिया है और केतकी के पुष्प से झूठी गवाही भी दिलवा दी तो त्रिकालदर्शी शिव ने ब्रह्मा जी और केतकी के पुष्प का झूठ जान लिया। उसी समय उन्होंने न सिर्फ ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया जिसने...

Mahashivratri Katha - 1

(शिवपुराण )  पूर्वकाल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। उस चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। जिससे उसके मन में शिव के प्रति अनुराग उत्पन्न होने लगा। शिव कथा सुनने से उसके पाप क्षीण होने लगे। वह यह वचन देकर कि अगले दिन सारा ऋण लौटा दूंगा, जंगल में शिकार के लिए चला गया। शिकार खोजता हुआ, वह बहुत दूर निकल गया। शाम हो गई किन्तु उसे कोई शिकार नहीं मिला तो वह तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़कर रात्रि में जल पीने के लिए आने वाले जीवों का इंतज़ार करने लगा। बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था, जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। प्रतीक्षा, तनाव और दिनभर भूखा-प्यासा शिकारी बेल के पत्ते तोड़ता और नीचे फेंक देता। इस प्रकार बिल्बपत्र शिवलिंग पर गिरते गए और चूंकि उसने दिनभर कुछ नहीं खाया था, इस...

महादेव की पूजा कब श्रेष्ठ है।

महादेव श्रृष्टि का सृजन और प्रलय सायंकाल-प्रदोषबेला में ही करते हैं, इसलिए इनकी पूजा आराधना का फल प्रदोष काल में ही श्रेष्ठ माना गया है। त्रयोदशी तिथि का अंत और चतुर्दशी तिथि के आरंभ का संधिकाल ही इनकी परम अवधि है। किसी भी ग्रह, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आदि तथा सुबह-शाम के संधिकाल को प्रदोषकाल कहा जाता है। इसलिए चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव ही है।वैसे तो शिवरात्रि हर माह के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, किन्तु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। 

Maha Shivaratri 2019| महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि Monday, 4 March  2019 Also called ਮਹਾਂ ਸ਼ਿਵਰਾਤਰੀ (Punjabi), ମହା ଶିବରାତ୍ରି (Odia), মহা শিবরাত্রি (Bengali), महा शिवरात्रि (Nepali), महा शिवरात्रि (Sanskrit), महा शिवरात्रि (Marathi), மகா சிவராத்திரி (Tamil), മഹാ ശിവരാത്രി (Malayalam), ಮಹಾಶಿವರಾತ್ರಿ (Kannada), మహా శివరాత్రి (Telugu), મહા શિવરાત્રી (Gujarati) महाशिवरात्रि (बोलचाल में शिवरात्रि) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग ( जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है ) के उदय से हुआ। अधिक तर लोग यह मान्यता रखते है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवि पार्वति के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।  कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि और बोलचाल में 'हेराथ' या 'हेरथ' भी जाता है। [  विकिपीडिया ] अनुष्ठान गेंदे के फूलों की अनेक प्र...

मनोकामना के अनुसार शिव पूजन

औढर दानी, सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता भगवान शिव विवाह में समस्या आ रही हैं तो आप महाशिवरात्रि पर गन्ने के रस से शिव का अभिषेक करने  से शीघ्र विवाह का संयोग बनता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। कर्ज  से मुक्ति व  पारवारिक सौहार्द में वृद्धि :  शहद से अभिषेक से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही जीवन से कर्ज का मर्ज भी दूर हो जाता है और परिजनों के बीच सामंजस्य बना रहता है। वाहन सुख : दही से अभिषेक करने पर जीवन से जुड़ी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। साथ ही साधक को वाहन सुख की प्राप्ति होती है।  आरोग्य  और संतान :कच्चे दूध से शिव का अभिषेक करने से आरोग्य की प्राप्ति होती हैं और संतान का सुख मिलता है।  दु:खों से मुक्ति : जीवन से जुड़े तमाम तरह के दु:खों को दूर करने के लिए महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का किसी पवित्र नदी के जल से "ॐ नम: शिवाय" मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें। धन और लंबी आयु : धन में वृद्धि और लंबी आयु पाने के महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का गाय के घी से अभिषेक करें। इस पूजन से भगवान शिव प्रसन्न ...

शिवरात्रि

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे। माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।  शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥ भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी। ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि...

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