सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नमस्ते शारदे देवी

 नमस्ते शारदे देवी सरस्वती मतिप्रदे।

वसत्वं मम जिह्वाग्रे सर्वविद्याप्रदाभव॥
Namaste Shārade Devi, Saraswati Mati‑prade
Vasatvaṃ Mama Jihvāgre, Sarva‑Vidya‑Pradā Bhava

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।


श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।


Shrīṃ Hrīṃ Sarasvatyai Svāhā.


ऐं वाग्वादिनी वद वद स्वाहा।


Aim Vāgvādinī Vad Vad Svāhā.



12 नाम (द्वादश नामावली)

  1. ॐ भारत्यै नमः

  2. ॐ सरस्वत्यै नमः

  3. ॐ शारदायै नमः

  4. ॐ हंसवाहिन्यै नमः

  5. ॐ जगतीख्यातायै नमः

  6. ॐ वाणीश्वर्यै (वागीश्वरीyai) नमः

  7. ॐ कौमार्यै नमः

  8. ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः

  9. ॐ बुद्धिदात्र्यै नमः

  10. ॐ वरदायिन्यै नमः

  11. ॐ क्षुद्रघण्टायै (क्षुद्रघण्टायै/क्षुद्रघण्टायै) नमः

  12. ॐ भुवनेश्वर्यै नमः


प्रथमं भारती नाम, द्वितीया तु सरस्वती, तृतीया शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी, पंचम जगतिकायता, षष्ठ माहेश्वरी कथा, सप्तम तू कौमारी, अस्थम भ्रामराचारिणी, नवम विद्याधृतिनि, दशम वरदायिनी, एकादशम् रुद्रघंटा, द्वादशम भुनेश्वरी, अतानि द्वादशो नमामि या पितृचनुयादपि नाच विधा भव तत्स मन्त्र सिद्धिकर ताथा 





ॐ ऐं नमः।
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि | विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||
ओम ऐं ह्रीं क्लीं महा सरस्वती देवीय नमः
ॐ ऐं सरस्वत्यै नम:
ॐ सरस्वत्यै च विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः 
वद वद वाग्वादिनी स्वाहा
महो अर्णः सरस्वती प्रचेयति केतुना धियो विश्व विराजति
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने, विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते
ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः
ॐ सरस्वती मया दृष्ट्वा, वीणा पुस्तक धारणीम् । हंस वाहिनी समायुक्ता मां विद्या दान करोतु में ॐ ||
प्रथमं भारती नाम, द्वितीया तु सरस्वती, तृतीया शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी, पंचम जगतिकायता, षष्ठ माहेश्वरी कथा, सप्तम तू कौमारी, अस्थम भ्रामराचारिणी, नवम विद्याधृतिनि, दशम वरदायिनी, एकादशम् रुद्रघंटा, द्वादशम भुनेश्वरी, अतानि द्वादशो नमामि या पितृचनुयादपि नाच विधा भव तत्स मन्त्र सिद्धिकर ताथा 

ॐ अर्हं मुख कमल वासिनी पापात्मक्षयम्कारी वद वद वाग्वादिनी सरस्वती ऐं ह्रीं नमः स्वाहा॥

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नीलांजन समभास्वरूपिण्यै स्वाहा।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना, या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ||1||  शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं, वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्, हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्, वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नवरात्र

नवरात्र भारतवर्ष में हिंदूओं द्वारा मनाया जाने प्रमुख पर्व है। इस दौरान मां के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। वैसे तो एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में कुल मिलाकर चार बार नवरात्र आते हैं लेकिन चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं। बसंत ऋतु में होने के कारण चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र तो शरद ऋतु में आने वाले आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है। चैत्र और आश्विन नवरात्र में आश्विन नवरात्र को महानवरात्र कहा जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि ये नवरात्र दशहरे से ठीक पहले पड़ते हैं दशहरे के दिन ही नवरात्र को खोला जाता है। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग रुपों की पूजा को शक्ति की पूजा के रुप में भी देखा जाता है। मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि मां के नौ अलग-अलग रुप हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात उ...

कुमारी पूजन

कुमारी पूजन श्री दुर्गा देवी को प्रसन्न करने के लिए नवरात्रि में अष्टमी तथा नवमी को कुमारी कन्याओं का अवश्य खिलाना चाहिए इन कुमारीयों की संख्या 9 हो तो अति उत्तम किन्तु भोजन करने वाली कन्यायें 2 वर्ष से कम तथा 10से ऊपर नहीं होनी चाहिए। अष्ट वर्षा भवेद्वगौरी, वर्षा चश्रोरिणी, दस वर्षा भवेत् कन्या ऊर्ध्वे-ऊर्ध्वे रजस्वला । क्रमशः इन सव कुमारियों के नमस्कार मन्य ये हैं।-  1. कुमार्य्ये नमः  2. त्रिमूर्त्ये नमः  3. कल्याण्यै नमः  4. रोहिण्यै नमः  5- कालिकायै नमः  6- चण्किायै नमः  7- शाय्र्ये नमः  8. दुर्गाये नमः  9. सुभद्रायै नमः  कुमारियों में हीनांगी, अधिकांगी, कुरुपा नहीं होना चाहिये। पूजन करने के बाद जब कुमारी देवी भोजन कर लें तो उनसे अपने सिर पर अक्षत छुड़वायें और उन्हें दक्षिणा दें इस तरह करने पर महामाया भगवती अत्यन्न प्रसन्न होकर मनोरथ पूर्ण करती हैं। 

Mahashivratri katha-2

भगवान शिव ने केतकी का फूल का  पूजा से किए त्याग क्यों किया ? शिवरात्रि हर माह के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, किन्तु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी कौन बड़ा और कौन छोटा है, इस बात का फैसला कराने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। इस पर भगवान शिव ने एक शिवलिंग को प्रकट कर उन्हें उसके आदि और अंत पता लगाने को कहा। उन्होंने कहा जो इस बात का उत्तर दे देगा वही बड़ा है। इसके बाद विष्णु जी उपर की ओर चले और काफी दूर तक जाने के बाद पता नहीं लगा पाए। उधर ब्रह्मा जी नीचे की ओर चले और उन्हें भी कोई छोर न मिला। नीचे की ओर जाते समय उनकी नजर केतकी के पुष्प पर पड़ी, जो उनके साथ चला आ रहा था। उन्होंने केतकी के पुष्प को भगवान शिव से झूठ बोलने के लिए मना लिया। जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से कहा कि मैंने पता लगा लिया है और केतकी के पुष्प से झूठी गवाही भी दिलवा दी तो त्रिकालदर्शी शिव ने ब्रह्मा जी और केतकी के पुष्प का झूठ जान लिया। उसी समय उन्होंने न सिर्फ ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया जिसने...